गेंड़ी की शोभायात्रा से लेकर नर्मदा तट पर विसर्जन तक, वर्षों पुरानी परंपरा आज भी बरकरार
मंडला। मध्यप्रदेश के आदिवासी एवं लोक संस्कृति से समृद्ध मंडला शहर में वर्षों पुरानी पोला-पिठौरा की परंपरा आज भी पूरे उत्साह, उमंग और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। शहर के श्री बजरंग व्यायाम शाला, पुराना अखाड़ा, बस स्टैंड रोड से इस परंपरा का आयोजन लंबे समय से किया जाता रहा है। आयोजन में शहरवासियों की बड़ी भागीदारी देखने को मिलती है।

पोला-पिठौरा पर्व के अवसर पर सुबह से ही शहर में उत्साह का माहौल नजर आता है। छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक इस पारंपरिक आयोजन में शामिल होते हैं। लोग पारंपरिक रूप से गेंड़ी तैयार कर उसे लेकर शोभायात्रा में शामिल होते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच निकलने वाली यह शोभायात्रा मंडला की गलियों और प्रमुख मार्गों से गुजरती हुई रंगरेज घाट तक पहुंचती है।
शोभायात्रा के दौरान लोगों में विशेष उत्साह दिखाई देता है। पारंपरिक वेशभूषा और स्थानीय संस्कृति से जुड़े रंग इस आयोजन को और खास बना देते हैं। रंगरेज घाट पहुंचने के बाद गेंड़ी का विधिवत विसर्जन किया जाता है। श्रद्धालु आस्था के साथ इस परंपरा को पूरा करते हैं और इसके बाद अपने घरों की ओर लौटते हैं।

दूसरे दिन मनाया जाता है वड़गा
पोला-पिठौरा परंपरा के दूसरे दिन को स्थानीय रूप से ‘वड़गा’ कहा जाता है। इस दिन खाप का विसर्जन किया जाता है। इसके लिए लोग अपने-अपने घरों में पारंपरिक रूप से तैयार किए गए विभिन्न पकवान लेकर नर्मदा तट पर पहुंचते हैं।
घर में बनाए गए गुजिया, सेव, खुरमी और अन्य पारंपरिक पकवान इस आयोजन का विशेष आकर्षण होते हैं। विसर्जन की धार्मिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर प्रसाद और पकवान ग्रहण करते हैं। इस दौरान सामाजिक मेल-मिलाप और आपसी भाईचारे का भी सुंदर दृश्य देखने को मिलता है।

पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
स्थानीय लोगों के अनुसार, पोला-पिठौरा की यह परंपरा मंडला की पुरानी लोक संस्कृति और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। समय के साथ आधुनिकता बढ़ने के बावजूद इस परंपरा को लोगों ने आज भी जीवित रखा है। खास बात यह है कि नई पीढ़ी के बच्चे और युवा भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
मंडला की पहचान केवल उसकी ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत से ही नहीं, बल्कि ऐसी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक आयोजनों से भी होती है। पोला-पिठौरा के दौरान होने वाली गेंड़ी शोभायात्रा, नर्मदा तट पर विसर्जन और परिवारों द्वारा तैयार किए जाने वाले पारंपरिक पकवान इस पर्व को विशिष्ट बनाते हैं।
यह आयोजन लोगों को अपनी जड़ों और पुरानी परंपराओं से जोड़ने का काम करता है। साथ ही, समाज में भाईचारे, आपसी प्रेम और सामूहिकता की भावना को मजबूत करता है। यही वजह है कि वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी मंडला शहर में उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
मंडला की यह ऐतिहासिक लोक परंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने का संदेश देती है।